Friends mene rrb po me 2lac ka bond fill kiya h ...lekin joining abhi nhi hui hai... agar me ibps join krta hu to kya 2lac dene padenge.. plz help
Hey. Is 105 in mains a safe score for Selection ?
FRIENDS AND PEOPLE,
I NEED YOUR OPTIMISTIC ATTENTION!!
RRB PO 4 - WRITTEN CUTTOFF + 79 MARKS IN PO= SELECTION(HINDI REGION)
WHERE THERE WAS AROUND 800 GEN SEAT(HINDI REGION) AND AROUND 1700 TOTAL SEAT...
IN IBPS RRB PO INTERVIEW ( 1 MARK= 0.3)
IN IBPS PO INTERVIEW ( 1 MARK= 0.2)
SO STUDENTS SCORING 90 WITH AVERAGE INTERVIEW ALSO ARE IN RACE....(ATLEAST 6500 GEN PO SEAT)
YOU CAN ABUSE ME BUT CANNOT AVOID ME!!
OBC Cutoff for IBPS PO-5
For 2014---
60(Mains Written Cutoff) + 14.5(Marks above cutoff mains)=74.5 * .4= 29.8 + 7(Min interview marks i.e.35)=36.8(final cutoff)
For 2015---
80(Mains Written Cutoff) + 16.5(Marks above cutoff mains)=96.5 * .4= 38.6 + 7(Min interview marks i.e.35)=45.6(final cutoff)
For 2016--- 76(Mains Written Cutoff) + 17.5(Marks above cutoff mains)=93.5 * .4= 37.4 + 7(Min interview marks i.e.35)=44.4(final cutoff).
I think itnaa hi cutoff jana chahiye. Please naraz mat hona bhai log.
Some people around here seem to celebrate stupidity, ignore them & report them. Avoid indulging them by commenting on their posts.
This is my opinion, you have every right to disagree.
I AM ON THE HORNS OF DILEMMA!!
PLEASE SAVE ME
LOVE HUA,LOVE HUA
LOVE HUA,LOVE HUA
LOVE HUA,LOVE HUA
BUT WILL I MAKE TO THE FINAL LIST!!
Shakespeare said..wht is der in d name..but i hv realised dat der is a lot in it..just few days back i stopped checking pg posts..but alas..pagal guy kept the sanctity of its name..and i came back..vellapanti tops my priority list these days.
36 days to go
Sc cat me BOB PNB BOI k liye kitta chahye final cutt off????
Bhai log yeh batao 1:3 ratio mai bulaya hai iska matlab agar mere say koi 2 bandey marks mai pichey hai toh mera job Pakka... P.s: just a thought. ..
When Shivaji Maharaj went to Afzal Khan for peace, he knew that it is in character of Afzal to try and stab him in the back. So he went in with an armour concealed in the back. As suspected, Afzal tried to strangle Shivaji and put a dagger in his back but then Shivaji, in an instant, tore Afzals insides out with his tiger knife.
Now one would expect the enemy to learn it's lessons and fall in line but things are getting back to worse in today's India.
A few years back, terrorists attacked our temple of democracy - our Parliament and terrorist Afzal was hanged for it. Recently some traitors in JNU raised slogans in support of that terrorist and vowed to fight till India destruction.
To them, the message is simple - we have and will continue to exterminate your lot. No Afzal shall ever survive the wrath of the nationalist people of India.
So be warned, do not test their patience, dear Afzals and other Jihaadis out there.....!!
हरियाणा की हिंसा से उठे सवाल, क्या हिंसा के पीछे सियासी साज़िश?
हमारी राजनीति गांधी का नाम इस तरह से जपती है जैसे गांधी गांधी करने से उसके भीतर गांधी की आत्मा आ जाती हो। तमाम नागरिक और नैतिक आचरणों के लिए गांधी का आह्वान दिन रात किया जाता रहता है लेकिन जब हम धरना प्रदर्शन करने जाते हैं तो गांधी को उसी दीवार पर छोड़ आते हैं जहां उनकी टंगी हुई तस्वीर को देखकर हम ख़ुद को गांधी घोषित करते रहते हैं। जिस गांधी ने अहिंसा को राजनीतिक हथियार के रूप में स्थापित किया, उस गांधी के देश में कोई धरना प्रदर्शन बिना तोड़ फोड़ के पूरा नहीं होता है। शायद हम न तो गांधी को जानते हैं और न समझते हैं और न गांधी जैसा होना चाहते हैं। हम सब अथाह हिंसा से भरे हुए हैं। अकेले हिंसा को अंजाम देने में डर लगता है इसलिए जब मौका मिलता है भीड़ के साथ मिलकर हिंसा करने लगते हैं। हरियाणा में जो हुआ वो पहली बार नहीं हुआ और अंतिम बार के लिए नहीं हुआ है। अभी हाल में गुजरात में पटेल आरक्षण की मांग के दौरान हुआ, उससे पहले हम गुर्जर आरक्षण के समय देख चुके हैं। बाबरी मस्जिद से लेकर सिख नरसंहार, गोधरा से लेकर गुजरात दंगा।
हमारे भीतर हिंसा कहां से आती है। अहिंसा अहिंसा करते करते हम हिंसा क्यों करते हैं। ज़रूरी है कि हम बात करें कि भीड़ कैसे बनती है। किससे बनती है। हम भीड़ में क्यों बदल जाते हैं।
नोबल पुरस्कार विजेता एलियस कनेती ने क्राउड एंड पावर नाम से एक किताब लिखी थी 50 के दशक में। कनेती बुल्गारिया के रहने वाले थे और जर्मन में लिखते थे। अपना सारा जीवन दुनिया भर में तरह तरह की बनने वाली भीड़ के अध्ययन में लगा दिया। वैसे नोबल पुरस्कार साहित्य के लिए मिला मगर इनकी पढ़ाई लिखाई रसायनशास्त्र की थी। कनेती ने यह पड़ताल करने की कोशिश की कि भीड़ कैसे बनती है। उसका व्यवहार कैसा होता है। भीड़ कितने प्रकार की होती है। खेल के मैदान की भीड़ कैसे चर्च में जमा होने वाली भीड़ से अलग होती है और राजनीतिक भीड़ और हिटलर को सुनने आने वाली भीड़ कैसी होती थी।
भारत में हमें रोज़ कोई न कोई मसला भीड़ में बदल देता है, मगर हम भीड़ बनने की प्रक्रिया को ठीक से समझ नहीं पाते। कौन लोग कहां से आ जाते हैं। कौन लोग होते हैं जो अहिंसा की बात करते हैं और उसी में से कौन लोग होते हैं जो हिंसा की बात करते हैं। हम सबने अपने जीवन में तरह तरह की भीड़ देखी है। लेकिन हम कभी नहीं जान पाए कि इस भीड़ को कौन संचालित करता है। उस पर नियंत्रण किसका होता है। ज़रूर भारत में भी लोगों ने भीड़ के बनने की प्रक्रिया पर काम किया होगा मगर मकसद सिर्फ इतना था कि हम भीड़ के बारे में सोचें। भीड़ की संभावना और ख़तरों के प्रति सतर्क हों।
हरियाणा के कई ज़िलों में खासकर रोहतक में आरक्षण की ओट में कौन लोग रहे होंगे जो दुकानों, होटलों, मकानों और कारों को जला गए। हिंसा और आगजनी की जितनी भी तस्वीरें देखीं उनमें से ज्यादातर में जलाने वाले लोगों की क्लोज़अप तस्वीर नहीं थी। कई बार इन तस्वीरों को देखकर लगता है कि क्या ये अपने आप जल गईं। जलने के बाद तरह तरह के बयान आने लगते हैं कि हमारे समाज के बीच के किसी ने नहीं जलाया। इन्हें असामाजिक तत्वों ने जलाया। क्या किसी राज्य में इतने असमाजिक तत्व होते हैं जो एक ज़िले की कई दुकानों को जला देते हैं। मकानों को फूंक देते हैं और यहां तक कि एसडीएम को कार से उतार कर उनकी कार फूंक देते हैं। जैसा आज हरियाणा के मेहम में हुआ। तीन चार दिनों तक हिंसा के तांडव के बाद असामाजिक तत्वों के पास इतनी ऊर्जा बची हुई थी कि अधिकारी की कार जला दें। हर हिंसा में ये असामाजिक तत्व इतनी आसानी से अज्ञात और अंतर्ध्यान कैसे हो जाते हैं। क्या वाकई इनका कोई चेहरा नहीं होता। इनका कोई शरीर नहीं होता। ये आत्मा की तरह आते हैं और किसी कार या होटल या मकान में घुस कर उसे जलाकर राख कर देते हैं। राज्य की पुलिस, सेना की मौजूदगी के बाद भी ये तत्व कैसे इतने निराकार होकर इतनी हिंसा कर जाते हैं। आखिर जो लोग जला रहे होते हैं उनकी तस्वीर क्यों नहीं छपती। क्यों नहीं रिकॉर्ड की जाती है। जलते हुए मकान और कारों की तस्वीर अधूरी हकीकत ही बयां करती है।
जाट आरक्षण के दौरान जो हिंसा हुई उसमें 20,000 करोड़ का नुकसान बताया जा रहा है। अब पता नहीं जिनके होटल जले हैं, कारे जलीं हैं, मॉल जले हैं उन्हें उसका हर्जाना मिलेगा या नहीं। जाट नेता कहते हैं कि हिंसा उनकी तरफ से नहीं हुई। कोई और लोग थे। ये कोई और कौन थे जो पूरे हरियाणा के लोगों को डरा गए। जिन्होंने पानी की सप्लाई रोक दी। खाने पीने की चीज़ों को दिल्ली आने तक रोक दिया।
कभी हम भ्रष्टाचार के नाम पर भीड़ बन जाते हैं। कभी धर्म के नाम पर भीड़ बन जाते हैं। कभी जातिवाद तो कभी राष्ट्रवाद। भीड़ लोकतंत्र का एक ज़रूरी हिस्सा है। इनका बनना रोका नहीं जा सकता लेकिन सोचा तो जा सकता है कि आरक्षण की लड़ाई में इतनी हिंसा की गुंज़ाइश कैसे पैदा हो गई कि लोगों ने अपने ही शहर को जला दिया। पश्चिम बंगाल के माल्दा में भी ऐसी ही एक भीड़ आई जो थाने तक जला गई। रोहतक, सोनीपत, जींद, हिसार, झज्जर, भिवानी और पानीपत सहित कई जिलों में ऐसी ही भीड़ आई और जलाकर मिटाकर ग़ायब हो गई। 16 लोग मारे गए हैं और 80 से ज्यादा लोग अस्पतालों में है। हिंसा की दास्तानों को ठीक से दर्ज नहीं किया जा सका है। सिर्फ उसके प्रमाण हैं जो हमें जली हुई कारों और मकानों की शक्ल में दिखाये जाते हैं।
इससे पहले गुर्जर आरक्षण के वक्त भी भयंकर हिंसा हुई थी। 2007 के साल में गुर्जर आंदोलन की हिंसा जब राजस्थान से दिल्ली पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के पुलिस प्रमुखों से पूछा था कि वे बतायें कि उन्होंने हिंसा पर कार्रवाई क्यों नहीं की।
अदालत ने पुलिस प्रमुखों से हलफनामे में यह भी लिखने को कहा था कि अगर कोई ऐक्शन नहीं लिया गया तो क्यों नहीं लिया गया। अदालत ने कहा था कि एक हफ्ते से पब्लिक और प्राइवेट प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया जा रहा है और रोकने का प्रयास तक नहीं हो रहा। लगता नहीं कि नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है। तब कोर्ट ने यह भी कहा था कि नुकसान पहुंचाने वाले कैमरे पर ऐसे अपना चेहरा चमकाते हैं जैसे कोई बड़ा काम किया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के एक फैसले को सही ठहराया था जिसमें कहा था कि नुकसान की भरपाई उन्हीं लोगों से की जाए जिन्होंने पब्लिक और प्राइवेट प्रॉपर्टी को तबाह किया है। हरियाणा सरकार और पुलिस प्रमुख को नुकसान के साथ साथ नुकसान पहुंचाने वालों की शिनाख्त और उनके खिलाफ कार्रवाई के बारे में ज्यादा बताना चाहिए। आखिर ये कैसे हो सकता है कि साक्षात संपत्तियों को अज्ञात लोग जला जाएं। यह भी देखा जाना चाहिए कि कौन लोग भड़का रहे थे। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के सहयोगी का एक फोन रिकॉर्ड सामने आने का दावा किया जा रहा है जिसमें वे सिरसा में हिंसा न होने पर गुस्सा हो रहे हैं। उसी तरह बीजेपी के सांसद सैनी के एक वीडियो फुटेज की बात हो रही है जिसमें वे जाट समाज को ललकार रहे हैं। इन दोनों रिकॉर्डिंग की सत्यता की जांच कर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन क्या होगी? कुछ लोग कांग्रेसी के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं तो कुछ लोग सांसद सैनी के खिलाफ कार्रवाई की। बहुत कम लोग हैं जो दोनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। हम इस तरह की हिंसा को लेकर दिनों दिन उदासीन और सामान्य होते जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में हुई हिंसा को लेकर संज्ञान लिया है। भारत के चीफ जस्टिस ने कहा है कि ''हमारे पास ये विश्वास करने का आधार नहीं है कि सरकार ने कोई ऐक्शन नहीं लिया। हम लोगों से अपील करते हैं कि शांति बनाए रखें और संपत्तियों को नुकसान न पहुंचाएं।''
हमारे रिपोर्टर मुकेश सिंह सेंगर ने सीसीटीवी का एक फुटेज भेजा है। इस तस्वीर को हम इसलिए देखें ताकि हम समझ सकें कि हिंसा करने वाले अज्ञात नहीं होते हैं। आप साफ साफ देख सकते हैं कि नौजवान से लेकर बूढ़े तक इसमें चलते नज़र आ रहे हैं। किसी के हाथ में लाठी है तो किसी के हाथ में खंभे जैसी कोई चीज़। किसी ने अपना चेहरा ढंक लिया है। इतनी संख्या में अचानक से असमाजिक तत्व नहीं हो सकते हैं। इस तरह की भीड़ अचानक भी नहीं बनती होगी। ये ज़रूर किसी रणनीति के तहत एक जगह मिलती होगी और तरह-तरह के हथियार साथ लेकर चलती होगी। क्या इतने लोग गिरफ्तार हुए हैं। क्या इतने लोग गिरफ्तार होंगे। अगर ये लोग ऐसे छोड़ दिये जाएंगे तब तो जिनके साथ हिंसा हुई है उन पर क्या बीतेगी। सोमवार सुबह कुछ लोग जिनकी दुकानें जली हैं वो हमारे सहयोगी मुकेश सेंगर से कह रहे थे कि अब वे यहां नहीं रहेंगे। उन्हें भरोसा नहीं हो रहा है। ये भीड़ कहां से आ रही है और कहां जा रही है ये हमें पता नहीं चल सका। लेकिन जिस तरह से हिंसा हुई है उससे ध्यान हटाना ठीक नहीं रहेगा। इस फुटेज की भी जांच चल रही है और इसमें दिखने वाले लोगों की भी। उम्मीद है हरियाणा पुलिस ठोस कार्रवाई करेगी। हम बस खुद को पहचानने के मकसद से ये फुटेज दिखा रहे हैं।
कई बार भीड़ अचानक हिंसक हो उठती है लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता होगा। लेकिन जब भीड़ छंट गई है तो अगली भीड़ बनने से पहले इस पर सोचा जाना चाहिए कि हमारे भीतर इतनी हिंसा कहां से आती है। कभी हम मुसलमानों के खिलाफ हिंसक भीड़ में बदल जाते हैं, कभी सिखों के खिालाफ बदल जाते हैं कभी हिन्दुओं के खिलाफ बदल जाते हैं कभी दलितों के खिलाफ तो कभी पंजाबी और सैनी के ख़िलाफ। हमारे भीतर जाति और धर्म को लेकर पूर्वाग्रह की कितनी परतें हैं। आज के दिन हरियाणा में इस भयावह हिंसा पर सामूहिक शोक होना चाहिए। जो 16 लोग मारे गए उन्हें इस आरक्षण से क्या लाभ होगा। जिनका सब कुछ जल गया, लुट गया क्या उनका जाट समुदाय से पुराना रिश्ता बन पाएगा। राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में हम इतनी आसानी से अपने सामाजिक रिश्ते क्यों गंवा देते हैं। हमें अमेरिका के ABC News का एक लेख मिला जिसे वहां के फोरेंसिक साइकिएट्रिस्ट डॉ. माइकल वेलनर ने लिखा है और हिंसक भीड़ की साइकोलॉजी यानी मनोवृत्ति के बारे में बताया है। भारत भले ही अमेरिका ना हो लेकिन अमेरिका और दुनिया के दूसरे इलाकों में भी ऐसी कई घटनाएं अक्सर देखने में आती रही है।
डॉ. माइकल वेलनर के मुताबिक भीड़ की हिंसा जिसमें लूटपाट, आगज़नी शामिल है इसके पीछे अक्सर ज़्यादा साज़िश नहीं होती। ऐसी भीड़ में ज़्यादातर युवा लोग सत्ता यानी शासन-प्रशासन को चुनौती देने के उत्साह में ऐसी भीड़ में शामिल हो जाते हैं क्योंकि इससे उन्हें एक तरह की जीत का सा अहसास मिलता है, कट्टर अपराधियों का प्रतिशत काफ़ी कम होता है। इस हिसाब से हरियाणा की हिंसा के बाद यह कह देना कि असामाजिक तत्वों ने हिंसा की, अपने आप में पर्याप्त या एकमात्र दलील नहीं है। वेलनर का कहना है कि कई लोग जब साथ आ जाते हैं और एक भीड़ की शक्ल ले लेते हैं तो उनमें ये डर ख़त्म हो जाता है कि जो ग़लत काम वो कर रहे हैं उसके लिए उन्हें सज़ा भी हो सकती है। हिंसक भीड़ में लूटपाट की गतिविधि तब बढ़ जाती है जब कई आपराधिक प्रवृत्ति के लोग इसे अपनी संपत्ति में विस्तार के मौके के तौर पर देखने लगते हैं। ये भी ग़लत है कि नाउम्मीदी भीड़ की हिंसा को बढ़ावा देती है। नाउम्मीदी हिंसा की बजाय निष्क्रियता को पैदा करती है।
हमने वेलनर के लेख में काफी कांट छांट कर दी है, उनकी बात से सहमत असहमत हुआ जा सकता है लेकिन हमें भीड़ और असामाजिक तत्वों को समझना तो पड़ेगा। वेलनर से कुछ उपाय भी बताये हैं। उनका कहना है कि भीड़ की हिंसा रोकने के लिए ज़रूरी है कि आप उसमें छुपी आपराधिकता का पता करें। ये ज़िम्मेदारी चुने हुए नेताओं, समुदाय के नेतृत्व, शिक्षकों, अभिभावकों, मास मीडिया और पुलिस की होती है। लेकिन पुलिस की क्रूर ताक़त भी इसका समाधान नहीं है। सिर्फ़ गिरफ़्तारी भी हल नहीं है क्योंकि ऐसी हिंसा में शामिल जो लोग होते हैं वो जानते हैं कि उन्हें उनके अपराध की सीमित सज़ा मिलेगी ख़ासतौर पर जब वो अपराध अराजकता या अफ़रातफ़री की स्थिति में किया जा रहा हो। ऐसे व्यवहार को रोकने के लिए दूसरे सामाजिक उपकरण भी हैं। मीडिया को ऐसी हिंसा का शिकार होने वाले लोगों ख़ासतौर पर ग़रीब और अल्पसंख्यकों की कमज़ोरी पर ज़ोर देना चाहिए। मास मीडिया ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति जगाने और नुकसान के प्रति लोगों को सचेत करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा जो लोग ऐसी घटनाओं में शामिल हों उन्हें रोकने के लिए शर्म भी एक अहम ज़रिया हो सकती है। ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों के नाम, उनके परिवारों के नाम, उनके गुटों के नाम सार्वजनिक करना एक मज़बूत तरीका हो सकता है।
खैर इस वक्त अज्ञात असामाजिक तत्व क्या कर रहे होंगे जिन्होंने हिरयाणा के कई जिलों में लूट पाट और हिंसा की है। क्या वे हमेशा के लिए बच जायेंगे। क्या वे सिर्फ दो चार ही होंगे।
जाट समुदाय से जुड़ी कुछ बातें
इस मामले में आगे बढ़ने से पहले जाट समुदाय से जुड़ी कुछ बातें जान लेते हैं। जाट समुदाय मूल रूप से खेती पर आधारित समुदाय है और हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत कुल नौ राज्यों में बसा हुआ है। इस समुदाय के लोगों के पास खेती की बड़ी जोत यानी बड़ी लैंड होल्डिंग रही है। जाट समुदाय की कुल जनसंख्या क़रीब सवा आठ करोड़ है। बीते कुछ समय में कुछ राज्यों ख़ासतौर पर हरियाणा और पंजाब में ये समुदाय राजनीतिक तौर पर ज़्यादा सक्रिय और असरदार होता गया। हरियाणा में जाट राजनीतिक तौर पर सबसे असरदार समुदाय रहा है जो राज्य की जनसंख्या का क़रीब 29 फीसदी है। अब देखते हैं कि इनकी मांग है क्या है। जाट समुदाय की मांग है कि उसे ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण दिया जाए।
हरियाणा में जाटों के अलावा जाट सिख, रोर, त्यागी और बिश्नोई समुदाय की भी ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग रही है। उन्हें आश्वासन दिया गया है कि हरियाणा सरकार आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग यानी ईबीसी में इन पांच समुदायों का कोटा दस से बढ़ाकर बीस फीसदी कर देगी। इसके अलावा ये वादा भी किया गया है कि ईबीसी समुदाय में अधिक से अधिक जाटों को शामिल करने के लिए वार्षिक आय की सीमा ढाई लाख से बढ़ाकर छह लाख कर दी जाएगी।
बहुत पुरानी नहीं है जाटों की आरक्षण की मांग
जाट समुदाय की आरक्षण की ये मांग बहुत पुरानी नहीं है। सबसे पहले मार्च 2008 में अखिल भारतीय जाट महासभा ने जींद में हुए एक सम्मेलन में आरक्षण की मांग मुख्य रूप से उठाई। सितंबर 2010 में अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (AIJASS) ने जाने-माने जाट नेता हवा सिंह सांगवान की अगुवाई में हिसार के मय्यर गांव में रेल ट्रैफ़िक रोका। इस दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों में एक युवक की मौत हुई। मार्च 2011 में AIJASS ने मय्यर गांव में फिर अपना आंदोलन शुरू किया। तब प्रदर्शनकारी रेल पटरियों पर बैठ गए और रेल ट्रैफ़िक रोक दिया। दिसंबर 2012 में हरियाणा की पिछली भूपिंदर सिंह हुड्डा सरकार ने जाट समुदाय को स्पेशल बैकवर्ड क्लास का दर्जा दिया और जाट समुदाय समेत कुल पांच समुदायों के लिए इसका दस फीसदी कोटा निर्धारित कर दिया।
उस समय सर्वजन खाप आरक्षण समिति ने दिल्ली को जाने वाली सड़कों को रोकने का आंदोलन शुरू करने की धमकी दी थी लेकिन हरियाणा सरकार ने उससे पहले ही ये फ़ैसला ले लिया था। हरियाणा सरकार पहले ही अन्य पिछड़ी जातियों को 27 फीसदी और दलितों को 20 फीसदी आरक्षण दे रही थी। इसके बाद दस फीसदी आरक्षण पांच और समुदायों को देने से ये आरक्षण कुल मिलाकर 57 फीसदी हो गया। ऊपर से दस फीसदी आरक्षण आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों को देने का भी फ़ैसला हुआ जिसका मतलब ये हुआ कि हरियाणा में कुल 67% आरक्षण हो गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट 1992 में तमिलनाडु से जुड़े एक ऐतिहासिक फ़ैसले में आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा निर्धारित कर चुका है।
Friends , I hav seen in comments in this group that IBPS clerk will be paid clearing allowance of Rs.180/- per day. Is that true? If so what is that allowance. Plz someone elucidate this. Thank you.
Dear friends, This forum is related to IBPS PO 5. Why are we posting comments which are political in nature? If someone is interested in talking politics and proving their loyalties, etc. They should start a new thread rather than polute the sanctity of this thread. Puys comment if you agree to my views and even if you don't. The level of discourse in this thread has fallen to new lows lately.