असीम खुराना जी को मेरा खुला पत्र
आपको मेरा सादर प्रणाम| पत्र इसलिए लिख रहा हूँ की शायद मेरी आकांक्षा, मेरा भविष्य आपके फैसलों पर निर्भर करता है| आपके आयोग की कार्यप्रणाली, उसकी विश्वसनीयता, उसकी तटस्था विगत वर्षों में संदेहास्पद रही है| छात्र हित कटऑफ के बोझ ने निचे अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था ऐसे में सुधार की कोशिश करना प्रशंसनीय है| लेकिन इस सुधार का आयोग के रवैये के आगे कोई दूरगामी परिणाम नहीं दिखता|
इसलिए की अबतक हुए इतने व्यापक धांधलियों को रोकने के लिए आयोग ने परीक्षार्थियों को परेशान करने के अलावा क्या उपाय किये? अपने कितने कर्तव्यहिन कर्मचारियों को सबक सिखाई, कितने गड़बड़ियों को पकड़ा? न जाने कितने अयोग्यों को नौकरी दी गयी पर आयोग ने उन्हें चिन्हित करना क्यूँ जरूरी नही समझा? क्यूँ नहीं सीबीआई जांच कराई गयी? क्या ऐसा करना आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा नही करता!
सर, अभियर्थियों के हित में पैटर्न तो बदलना समझ में आता है लेकिन इस पैटर्न को हम पर थोपने से पहले कौन-कौन से मानदंड अपनाए? किन-किन लोगों से सुझाव लिए? कौन से आयोग का गठन किया? या फिर एसी कमरों में बैठकर उन्ही तीस मार खां के साथ मीटिंग करके पैटर्न बदल दिया जिनकी पैसों की डकार सारे छात्र अभी तक सुन रहे हैं!
आयोग को ये साफ़ करना चाहिए की पैटर्न बदलने से पहले क्या परीक्षार्थियों की वास्तविक राय जानी और कितनों की सुझाव पर अमल किये? खुराना सर, आयोग को जबावदेह बनाने की आदत डालिए| जिम्मेदार बनाने की कोशिश कीजिये| भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में किसी भी व्यक्ति या आयोग को ये अधिकार नहीं होने चाहिए की उसकी हर फैसलों को, हर नतीजे को छात्र सर, आँखों पर लेंगे| क्योंकि अधिकार के नाम पर शोषण लोकतंत्र का नया गुंडा है| उसे सच जानने का अधिकार दीजिये| या अधिकार के नाम पर खुद की कार्यप्रणाली को बचाने के लिए कभी भी कुछ भी थोप देने से बचिए| गड़बड़ियों की जिम्मेदारी तय कीजिये, ये नहीं होता की आपकी व्यवस्था की गलती की सजा छात्र को मिले, उस पर फिर से तरह-तरह की परीक्षा थोपी जाए| क्योंकि डिस्क्रिप्टिव का शगुफा आपके आयोग को मनमर्जी प्रदान करता है, पैसे डकारने की खुली चुनौती देता है| उसमें पारदर्शिता लाइए, अंक देने के पैमानों को एक जैसा सब पर लागू करके सार्वजानिक कीजिये|
पर मुझे नहीं लगता की आयोग को मेरी सलाह की जरूरत है| बहुत बड़े-बड़े विद्वान होंगे आपके पास लेकिन हकीकत से अनजान और शायद सैलरी के पैसों से मदहोश भी| लेकिन एक बार वास्तविकता से साक्षात्कार करने की कोशिश करके दिखिए तभी गरीबी, मेहनत, अभाव में जीने वाले और मकान मालिक द्वारा सताए छात्रों की छात्र हित समझ आएगी...
(लेखक:- अश्वनी कुमार)
गुस्सा इसलिए की मुझे अलग-अलग विषयों पर 250 से ज्यादा ब्लॉग लिखने के अनुभव होने, विभिन्न समाचार पत्रों के सम्पादकीय, ऑनलाइन मैगजीनों में मेरे ब्लॉग को जगह मिलने के बावजूद भी एसएससी एलडीसी डिस्क्रिप्टिव में 2 अंक से और पटना हाई कोर्ट असिस्टेंट की मेन परीक्षा में एक अंक से रोका गया... वो भी जबरदस्ती और हम कुछ नहीं कर पाए...