Matrbhasha ke Purodha - हिन्दी साहित्य की अविरल गंगा

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*हिन्दी* भारत और विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। उसकी जड़ें प्राचीन भारत की संस्कृत भाषा में तलाशी जा सकती हैं। परंतु हिन्दी साहित्य की जड़ें मध्ययुगीन भारत की ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली और मारवाड़ी जैसी भाषाओं के साहित्य में पा...
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समूहगान - शुभ्र दासगुप्त

देश मतलब सिल्क का झकझक करता हुआ झंडा नहीं ।

देश मतलब रेड रोड पर परेड नहीं, टी०वी० पर मंत्रियों का श्रीमुख नहीं
देश का मतलब एसियाड, फ़िल्म फेस्टिवल, संगीत-समारोह नहीं ।

देश का मतलब कुछ और, कुछ अलग ही ।

बीड़ी बाँधते-बाँधते जो दुबला आदमी क्रमश: और दुबला हो रहा है
अनजाने में टी०बी० के कीटाणु अपने सीने की खाँचे में पाल रहा है
उस आदमी के निद्राहीन रात में जब गले में उठता है रक्त तब
उसी रक्त के धब्बों-थक्कों में
जागता है देश ।

सारा दिन ट्रेन की बोगी में आँवला या बादाम बेचता हुआ पढ़ा-लिखा युवक
जिसे हॉकर कार्ड पाने के बदले इच्छा के विरुद्ध जाना पड़ता है सभी रैलियों मीटिंग-समावेशों में
गला फाड़-फाड़कर लगाना पड़ता है 'बंदे मातरम' या 'इन्कलाब ज़िन्दाबाद' के नारे
उसी युवक की सेफ़्टीपिन लगी हवाई चप्पलजब टूट जाती है अचानक यातायात के पथ पर
तब उसी हताशा की घड़ी में
जागता है देश ।

सिनेमा हॉल के सामने सिल्क की सस्ती साड़ी और उससे भी सस्ती
मेकअप से खुद को बेचने के लिए सजाए जो मुफ़लिस लड़की
रोज़ ग्राहक पकड़ने की ख़ातिर तीव्र वासना में निर्लज्ज हो पल-पल गिनती
जब उसका ग्राहक आता है और वही ग्राहक जब बुलाता है उसे -“आ ...गाड़ी के अंदर “
उसी आह्वान में
जागता है देश ।

देश मतलब लालकिला से प्रधानमंत्री का स्वाधीनता भाषण नहीं
देश मतलब माथे पे लाल बत्ती लगाए झकमक अंबेसडर नहीं
सचिन का शतक या सौरभ की कैप्टेनसी नहीं देश का मतलब
देश का मतलब लीग या डुरांड नहीं |

देश मतलब कुछ और, कुछ अलग ही |

नौ बरस से बंद कारखाने में जंग लगे ताला लटकते गेट के सामने
झूलसा हुआ जो भूतपूर्व श्रमिक माँगता है भीख
उसकी आँखों की तीव्र अग्नि में है देश ।

नेताओं की बात पर ख़ून,डकैती सब पाप करके अचानक फँस जाने पर
इलाक़े में आतंक का पर्याय बना जो युवक पुलिस की धुलाई से
लॉकअप के अँधेरे में कराह रहा है
उसकी आँखों की भर्त्सना में है देश ।

सारा जीवन छात्रों को पढ़ाकर परिवारहीन स्कूल मास्टर !
जब प्राप्य पेंशन न पाकर रेलवे स्टेशन पर मांगने बैठते हैं भीख
उनके अल्मुनियम के कटोरे की शून्यता में है देश ।
देश है । रहेगा । बनावटी कोजागरी* में नहीं
असल अमावस की घोर अंधकार में ।


*आश्विन महीने के कोजागरी पूर्णिमा में धन की देवी लक्ष्मी के आगमन पर उनकी पूजा होती है |


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मेरा हिंदी प्रेम - जितेंद्र चौधरी

लोग मुझसे पूछते है कि आपको हिंदी से इतना प्रेम क्यों है? अपने देश मे ही जब लोग हिंदी को लात मारकर अंग्रेज़ी में बोलना अपनी शान समझते हैं, हिंदी मे बोलने वाले को पिछड़ा समझा जाता है। अंग्रेज़ी में बोलने वाले को ज़्यादा सम्मान दिया जाता है, फिर आप क्यों हिंदी के झंडे गाड़ने के चक्कर में रहते है।

दरअसल मैं भी दूसरे लोगों की तरह ही था, हिंदी मे पढ़ाई तो ज़रूर की थी, लेकिन कोई हिंदी मे लिखने को बोलता था तो नानी याद आ जाती थी। हिंदी लिखते-लिखते अंग्रेज़ी पर आ जाता था। लेकिन मुझे हिंदी से सच्चा प्रेम तब हुआ जब मैंने यूरोपीय देशों के लोगों और चीनी भाषियों का भाषा प्रेम देखा। जर्मनी और फ्रांस में अंग्रेज़ी जानने वाले तो बहुत मिलेंगे लेकिन शायद ही आप उनको अंग्रेज़ी में बात करने पर राज़ी करा पाएँ। यही हाल लगभग यूरोप के बाकी देशों का है, मैं मानता हूँ कि स्थितियाँ बदल रही हैं लेकिन अभी भी उनको अपनी भाषा दूसरी सभी भाषाओं से ज़्यादा प्यारी है। एक फ्रांसीसी से मैंने पूछा कि तुम्हे अंग्रेज़ी तो आती है फिर क्यों फ्रेंच में बात करते हो, तो बोला कि मुझे गर्व है कि मैं फ्रांसीसी हूँ, मुझे अपने देश और संस्कृति से प्यार है, इसलिए मैं फ्रेंच में बात करता हूँ और अंग्रेज़ी का इस्तेमाल सिर्फ़ तभी करता हूँ जब अत्यंत ज़रूरी हो। यकायक मुझे लगा क्या हम हिंदुस्तानी अपने देश या संस्कृति से प्यार नहीं करते।


एक और अनुभव बताता हूँ। मैं लंदन के एक म्यूज़ियम में अपने मित्र के साथ टहल रहा था। एक कलाकृति पर नज़र डालते ही मैंने अपने मित्र से कलाकृति के मुत्तालिक अंग्रेज़ी में कुछ पूछा, मित्र ने तो जवाब नही दिया लेकिन बगल में एक बुजुर्ग फिरंगी खड़ा था, उसने ठेठ हिंदी में जवाब दिया, मैं तो हैरान, हमने एक दूसरे को अपना परिचय दिया, इन फिरंगी महाशय की पैदाइश हिंदुस्तान की थी। ये पता चलते ही कि मैं उत्तर प्रदेश से हूँ उस फिरंगी ने बाकायदा भोजपुरी में बोलना शुरू कर दिया, हद तो तब हो गई जब उसने मुझसे ठेठ भोजपुरी में कुछ पूछा और मैंने जवाब देने के लिए बगलें झाँकते हुए अंग्रेज़ी का प्रयोग किया। उस दिन बहुत शर्म आई कि हम अपनी भाषा होते हुए भी अंग्रेज़ी को अपना सबकुछ मानते हैं। आख़िर क्यों?


कुछ दक्षिण भारतीय भाइयों का यह मानना है कि हिंदी एक क्षेत्रीय भाषा है, हालाँकि मैं उनकी बात से सहमत नही हूँ फिर भी मैं उनकी मजबूरी समझता हूँ कि वे हिंदी में लिख पढ़ नहीं सकते, इसलिए अंग्रेज़ी बोलते हैं, लेकिन कम से कम अपने उत्तर भारत में तो हिंदी को उसका पूरा सम्मान मिलना चाहिए।

अब सुनिए मेरा हिंदुस्तान के दौरे का किस्सा। मैं दिल्ली से रुढ़की जा रहा था, ट्रेन में एक जनाब से मुलाक़ात हो गई, किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, मैं नाम नहीं बताऊँगा, रास्ते भर मुझ से बतियाते रहे, मेरा परिचय जानकर कि मैं अप्रवासी हूँ, अंग्रेज़ी में शुरू हो गए, मैंने उनके सारे जवाब हिंदी में ही दिए, लेकिन वो थे कि अंग्रेज़ी से नीचे ही नहीं उतर रहे थे। लगातार उनकी बकझक सुनकर मैंने आख़िर पूछ ही लिया, क्या आपको हिंदी में बोलने में शर्म आती है, वे खींसे निपोरने लगे, और बातों ही बातों में मान लिया कि उन्हें हिंदी में बोलने में शर्म आती है, अंग्रेज़ी में बोलना ही भद्रता की निशानी है। मैंने जब उनको बताया कि दुनिया जहान के लोग अपनी-अपनी भाषा से प्यार करते हैं, हम भारतीय क्यों नही करते। जब आप प्रोफ़ेसर होकर ऐसी बात सोचते हैं तो आपके छात्रों का क्या होगा, जनाब के पास कोई जवाब नही था। हम क्यों ऐसा करते हैं कि अच्छी अंग्रेज़ी बोलने वाले के पीछे लग लेते हैं, और हिंदी बोलने वाले को किनारे बिठाते हैं। सरकार भी हिंदी दिवस मनाकर अपनी खानापूर्ति करती है और समझती है कि हिंदी का सम्मान हो गया। हम लोग कहते हैं, यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि हिंदी को उचित स्थान नहीं मिला, पर यह हमारी ग़लती है कि हम हिंदी को नहीं अपनाते। क्यों नही अपने बच्चों को हिंदी में बोलने के लिए प्रोत्साहित करते।


कहीं हम सभी तो हिंदी की इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार नही हैं?

आपका इस बारे में क्या कहना है?

निज भाषा उन्नति अहै¸ सब उन्नति को मूल¸

बिनु निज भाषाज्ञान के मिटै न हिय को सूल।


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अंततोगत्वा - ख़लील जिब्रान / बलराम अग्रवाल

एक अमीर था। अपने भंडार और उसमें रखी पुरानी शराब पर उसे बड़ा घमंड था। उसके पास पुरातन किस्म का एक सागर(शराब सुरक्षित रखने व कप में डालने वाला ढक्कनदार बर्तन) भी था जिसे खास मौकों पर वह अपने लिए इस्तेमाल करता था।


एक बार राज्य का गवर्नर उससे मिलने आया। अमीर ने उसके बारे में अनुमान लगाया और तय किया, "इस दो कौड़ी के गवर्नर के सामने सागर को निकलने की जरूरत नहीं है।"


फिर एक रोमन कैथोलिक बिशप उससे मिलने आया। तब उसने अपने-आप से कहा, "नहीं, मैं सागर को नहीं निकालूँगा। यह न तो उसका ही महत्व समझ पाएगा; और न ही उसमें रखी शराब की गंध की कीमत को इसके नथुने जान पाएँगे।"


राज्य का राजा आया और उसने उसके साथ शराब पी। लेकिन अमीर ने सोचा, "मेरे भंडार की शराब इस तुच्छ राजा से कहीं ज्यादा रुतबे वाली है।"


यहाँ तक कि उस दिन, जब उसके भतीजे की शादी थी, उसने अपने-आप से कहा, "नहीं, इन मेहमानों के सामने उस सागर को नहीं लाया जा सकता।"


साल बीतते गए और वह मर गया। उसे और एक बूढ़े को वैसे ही एक साथ दफनाया गया जैसे बरगद का बीज और किसी छोटे पौधे का बीज साथ-साथ जमीन में दफन होते हैं।


और उस दिन, जब उसे दफनाया गया था, रिवाज़ के मुताबिक सभी सागरों को बाहर निकाला गया। तब वह पुराना सागर भी दूसरे सागरों के साथ रख दिया गया। उसकी शराब को भी गरीब पड़ोसियों में बाँट दिया गया। किसी को भी उसके बेशकीमती होने का पता न चला।


उनके लिए, कप में डाली जाने वाली शराब सिर्फ शराब थी।

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खूनी हस्‍ताक्षर - गोपालप्रसाद व्यास

वह ख़ून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं

वह ख़ून कहो किस मतलब का जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश में होकर बहता है वह ख़ून नहीं है पानी है

आज़ादी का संग्राम कहीं पैसे पर खेला जाता है?
ये शीश कटाने का सौदा नंगे सर झेला जाता है

उस दिन लोगों ने सही सही खूँ की कीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मांगी उनसे कुर्बानी थी

बोले स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुमहे करना होगा
बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा

यह कहते कहते वक्ता की आंखों में खून उतर आया
मुख रक्त वर्ण हो गया दमक उठी उनकी रक्तिम काया

आजानु बाहु ऊंचा करके वे बोले रक्त मुझे देना
इसके बदले में भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना

वह आगे आए जिसकी रग में खून भारतीय बहता है
वह आगे आए जो ख़ुद को हिन्दुस्तानी कहता है

सारी जनता हुंकार उठी हम आते हैं, हम आते हैं
माता के चरणों में लो हम अपना रक्त चढाते हैं

हम देंगे देंगे ख़ून स्वर बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे

बोले सुभाष इस तरह नहीं बातों से मतलब सरता है
मैं कलम बढ़ता हूँ, आये जो खूनी हस्ताक्षर करता है

पर यह साधारण पत्र नहीं आज़ादी का परवाना है
इसपर तुमको अपने तन का कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है

साहस से बढे युवक उस दिन देखा बढते ही आते थे
चाकू छुरी कटारियों से वे अपना रक्त गिराते थे

फिर उसी रक्त की स्याही में वे अपना कलम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर हस्ताक्षर करते जाते थे

आज़ादी का इतिहास कहीं काली स्याही लिख पाई है?
इसको पाने को वीरों ने खून की नदी बहाई है

उस दिन तारों ने देखा था हिन्दुस्तानी विश्वास नया
लिखा था जब रणवीरों ने खूँ से अपना इतिहास नया
...जय हिंद

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टुकड़ों में भलाई - आकांक्षा पारे


हर जगह मचा है शोर

ख़त्म हो गया है अच्छा आदमी
रोज़ आती हैं ख़बरें
अच्छे आदमी का साँचा
बेच दिया है ईश्वर ने कबाड़ी को

'अच्छे आदमी होते कहाँ हैं'
का व्यंग्य मारने से
चूकना नहीं चाहता कोई

एक दिन विलुप्त होते भले आदमी ने
खोजा उस कबाड़ी को
और
मांग की उस साँचे की
कबाड़ी ने बताया साँचा
टूट कर बिखर गया है
बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में

कभी-कभी उस भले आदमी को
दिख जाते हैं, वे टुकड़े
किसी बच्चे के रूप में जो
हाथ थामे बूढ़े का पार कराता है सड़क
भरी बस में गोद में बच्चा लिए
चढ़ी स्त्री के लिए सीट छोड़ता युवा
चौराहे पर भरे ट्रैफिक में
मंदिर दिख जाने पर सिर नवाती लड़की

विलुप्त होता भला आदमी ख़ुश है
टुकड़ों में ही सही
ज़िन्दा है भलाई!

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नमामि मातु भारती - गोपालप्रसाद व्यास


नमामि मातु भारती !

हिमाद्रि-तुंग, श्रींगिनी
त्रिरंग- अंश- रंगिनी
नमामि मातु भारती
सहस्र दीप आरती !

समुद्र- पाद- पल्लवे
विराट विश्व –वल्लभे
प्रबुद्ध बुद्ध की धरा
प्रणम्य हे वसुंधरा !

स्वराज्य – स्वावलंबिनी
सदैव सत्य – संगिनी
अजेय ,श्रेय - मंडिता
समाज-शास्त्र-पण्डिता !

अशोक -चक्र –संयुते
समुज्ज्वले समुन्नते
मनोग्य मुक्ति –मंत्रिणी
विशाल लोकतंत्रिनी !

अपार शस्य – सम्पदे
अजस्र श्री पड़े-पड़े
शुभन्करे - प्रियंवदे
दया - क्षमा वंशवदे !

मनस्विनी – तपस्विनी
रणस्थली – यशस्विनी
कराल- काल- कलिका
प्रचंड मुंड- मालिका !

अमोघ शक्ति – धारिणी
कुराज कष्ट – वारिणी
अदैन्य मंत्र – दायिका
नमामि राष्ट्र – नायिका !

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वतन पर उठने वाले हाथो को जड़ से फाड़ दिखायेंगे - रवि कुमार भद्र

पुरखो ने अपने युद्ध लड़ा है

हम भी कुछ कर दिखलायेंगे

वतन पर उठने वाले हाथो को

जड़ से फाड़ दिखायेंगे


अहिंसक है पर कमज़ोर नही है

खून में अपने वोही रवानी है

लहू में अपनी कितनी गर्मी है

फिरंगियों को याद कहानी है


संभल जाओ दुसमन वतन के

लौटा वही ज़माना है

गोली का बदला गोली से ले जो

ये इतिहास अपना खूब पुराना है


अपने दम से वक्त बदलेंगे

दुनिया को सच्चाई दिखलायेंगे

वतन पर उठने वाले हाथो को

जड़ से फाड़ दिखायेंगे

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सच्चे दोस्त


कुछ नाम हैं जो लब पे अपने आप आ जाते हैं

जब एक सच्चे दोस्त की ज़रूरत होती है

वो दोस्त जो मेरी मुस्कराहट के पीछे छिपे दर्द को आज भी समझते हैं

जो आज भी करीब ना होकर भी, करीब है -

जब एक सच्चे दोस्त की ज़रूरत होती है

वो यादों में आकर लबों पे मुस्कराहट छोड जाते हैं.

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छोटे नहीं होते सपने-1 - लाल्टू


छोटे-बड़े तारे नहीं जानते ग्रहों में कितनी जटिल

जीवनधारा

आकाशगंगा को नहीं पता भगीरथ का

इतिहास वर्तमान

चल रहा बहुत कुछ हमारी कोशिकाओं में

हमें नहीं पता

अलग-अलग सूक्ष्म दिखता जो संसार

उसके टुकड़ों में भी है प्यार

उनका भी एक दूसरे पर असीमित

अधिकार

जो बड़े हैं

नहीं दिखता उन्हें छोटों का जटिल संसार

छोटे दिखनेवालों का भी होता बड़ा घरबार

छोटी नहीं भावनाएं, तकलीफें

छोटे नहीं होते सपने.

कविता,विज्ञान,सृजन,प्यार

कौन है क्या है वह अपरंपार

छोटे-बड़े हर जटिल का अहसास

सुंदर शिव सत्य ही बार बार.

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